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Showing posts from May, 2020

How privileged I am..

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PS - Rotate your phone to landscape mode for better reading. How privileged I am... that I have not been diagnosed with this virus "Corona"- an uninvited guest, that I have all the access to PPE's & to the doctors doing their best. that I didn't get stuck somewhere far away or at some remote location, that I am able to spend quality time with my family like any other vacation. How privileged I am... that I am not those migrants who have to walk miles in scorching heat to reach their home, that I have been watching web series all day, turning my AC ON. that still I am employed and my salary is being credited before the month ends, unlike those who lost their jobs and nowhere to go, everytime the economy bends. How privileged I am... that I am not residing in areas completely shattered by Amphan cyclone, that all this time I am pursuing my hobbies and not feeling alone. that my house is intact and not taken away by huge floods, ...

चैन की नींद

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(a story from somewhere around 2009) ये उन दिनों की बात है जब हमारे घर के बाहर कुत्ते/कुतिया रहा करते हैं | दरअसल हमारा घर उस चॉल के पुराने मकानों में से एक होता था जो कितने ही सालों से मिट्टी की बुनियाद पर ही खड़े थे | अब ये गली के बफादार जानवर ना तो घर के होते थे ना घाट के | जब मन किया तो आ गए और नहीं तो कहो पूरा दिन, दिखाई भी न दे आपको | पड़ोस की एक छोटी सी कोठरी में घर बना लिया था इन्होने अपना | काटने या डरने जैसी तो कोई परेशानी नहीं थी इनसे लेकिन सबसे बड़ी समस्या थी की ये घर के बाहर गंदगी कर जाते थे | अब मोदीजी की बात कहाँ पता थी उनको जो शौचालय के बारे में सोचते | इनका तो एक ही सिद्धांत था " जहाँ लगा,  वहाँ  हगा " |  पूरी पड़ोस इनकी गंदगी से परेशान थी और अब इस समस्या का हल किसी को समझ नहीं आ रहा था क्यूंकि इन्हे मारने का सवाल ही नहीं उठता था ,और कहीं दूर ले जा कर छुडवा दो तो ये वापस आ जाते थे | फिर सब यही सोचते थे की बूढ़े होकर अपने आप ही मर जाएंगे | लेकिन ऐसा होने से पहले वो अपने बच्चों को जन्म दे जाते थे और फिर उनके मरने के बाद, यही परेशानी उनके बच्चों से होने ल...

16 मजदूर

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09/05/2020  वो 16  मजदूर नहीं थे, 16 मजबूर थे | भूख के मारे थे , पैसे की किल्लत थी और अपनों से दूर थे || सब्र दिखाया था उन्होंने, सरकार घर पहुंचाएगी उनको | तभी तो अब तक के सारे इंतज़ार, उनको मंजूर थे || लेकिन कब तक रुकते, कब तक रोते, चल दिए पैदल ही | अभी तो 40 km ही चले थे, मंजिल से बेहद दूर थे || सोचा पटरी के रास्ते ही चले जायेंगे ताकि पुलिस से बच सकें | "रेल मिलेगी तो पकड़ लेंगे" - आँखों में ख्याबों के ऐसे नूर थे | थक गए तो बैठ लिए पटरी पर और आँख लग गयी | पैरों के दर्द और छालों के कुसूर थे || रेलगाड़ी आयी भी, और सब अपने घर भी गए | लेकिन साबुत कोई न बचा, सब के सब चकनाचूर थे || किसको परवाह थी ऐसे मजदूरों की | हम सब तो अपने आप में मगरूर थे || हमारे बीच तो 1 मीटर का ही फासला था, घर तो उनके मीलों दूर थे | वो केवल 16 मजदूर नहीं थे साहब, वो तो लाखों में ऐसे 16 मजबूर थे || May their souls rest in peace.....                        (Victims of Aurangabad train...