16 मजदूर

09/05/2020 

वो 16  मजदूर नहीं थे, 16 मजबूर थे |
भूख के मारे थे , पैसे की किल्लत थी और अपनों से दूर थे ||

सब्र दिखाया था उन्होंने, सरकार घर पहुंचाएगी उनको |
तभी तो अब तक के सारे इंतज़ार, उनको मंजूर थे ||

लेकिन कब तक रुकते, कब तक रोते, चल दिए पैदल ही |
अभी तो 40 km ही चले थे, मंजिल से बेहद दूर थे ||

सोचा पटरी के रास्ते ही चले जायेंगे ताकि पुलिस से बच सकें |
"रेल मिलेगी तो पकड़ लेंगे" - आँखों में ख्याबों के ऐसे नूर थे |

थक गए तो बैठ लिए पटरी पर और आँख लग गयी |
पैरों के दर्द और छालों के कुसूर थे ||

रेलगाड़ी आयी भी, और सब अपने घर भी गए |
लेकिन साबुत कोई न बचा, सब के सब चकनाचूर थे ||

किसको परवाह थी ऐसे मजदूरों की |
हम सब तो अपने आप में मगरूर थे ||

हमारे बीच तो 1 मीटर का ही फासला था, घर तो उनके मीलों दूर थे |
वो केवल 16 मजदूर नहीं थे साहब, वो तो लाखों में ऐसे 16 मजबूर थे ||

May their souls rest in peace.....                       
(Victims of Aurangabad train accident - 08/05/2020)                                            
- GG



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