वो 16 मजदूर नहीं थे, 16 मजबूर थे |
भूख के मारे थे , पैसे की किल्लत थी और अपनों से दूर थे ||
सब्र दिखाया था उन्होंने, सरकार घर पहुंचाएगी उनको |
तभी तो अब तक के सारे इंतज़ार, उनको मंजूर थे ||
लेकिन कब तक रुकते, कब तक रोते, चल दिए पैदल ही |
अभी तो 40 km ही चले थे, मंजिल से बेहद दूर थे ||
सोचा पटरी के रास्ते ही चले जायेंगे ताकि पुलिस से बच सकें |
"रेल मिलेगी तो पकड़ लेंगे" - आँखों में ख्याबों के ऐसे नूर थे |
थक गए तो बैठ लिए पटरी पर और आँख लग गयी |
पैरों के दर्द और छालों के कुसूर थे ||
रेलगाड़ी आयी भी, और सब अपने घर भी गए |
लेकिन साबुत कोई न बचा, सब के सब चकनाचूर थे ||
किसको परवाह थी ऐसे मजदूरों की |
हम सब तो अपने आप में मगरूर थे ||
हमारे बीच तो 1 मीटर का ही फासला था, घर तो उनके मीलों दूर थे |
वो केवल 16 मजदूर नहीं थे साहब, वो तो लाखों में ऐसे 16 मजबूर थे ||
May their souls rest in peace.....
(Victims of Aurangabad train accident - 08/05/2020)
- GG
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