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Showing posts from 2020

When 2020 said a good bye - I got a LUDO life !

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So here I am, so excited after watching this netflix movie - 'LUDO' that just few minutes later, it was planned to give it a second shot - this time with flatmates (pandit and  gujju). Three guys who just came back to gurgaon for planned 9 to 7 job from their respective homes after diwali holidays fixed their eyes to SONY 32'' box and soon the song started - "oooooh betaji :P ". I was so unaware of the lyrics of this song that I didn't realize that "zindagi ki hawa is going to be garam very soon." A day later at around 2.30 AM, when I was completely lost in my dreams that night, I heard the voice - Bhai paracetamol hai ? It was my flatmate pandit who started giving me direction at 2.30 AM that this medical shop was still open and I had to bring paracetamol for him. I was like - " Bhaag saale, subah kha liyo. Bukhar hi to hai. Soja " Since it was mandatory to get tested for COVID-19 before resuming work from office, we did that on the ve...

मेरा सुकून

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खुशियां तो हमने बहुत बाटीं है आपसे, चलो आज अपने ' सुकून ' का मतलब समझाते हैं || जब रात को छत पर जाते ही वो अक्सर अधूरा दिखने वाला चाँद, पूरा नज़र आ जाए , दूधिया सा सफ़ेद, इतना खूबसूरत कि आपको अपनी आँखों के होने की खुशनसीबी का एहसास होने लगे , वो सुकून है || जब मीलों दूर बैठे उन गिने चुने ४-५ लोगों की खैरियत का अंदाजा ,  संचार सेवा  आपके कान के पर्दों को  कराने  लगे, वो सुकून है || जब वो दोनों हाथों की उंगलियां जो आपस में साथ चलने को राज़ी नहीं | कोशिशों बाद आपस में इस कदर घुल मिल जाएँ कि उनकी चाल से संगीत निकलने लगे , वो सुकून है || जब चलते राहगीर की कुछ मदद करने पर, बिना मांगे तरक्की की दुआ मिलने लगे, वो सुकून है || जब किसी तस्वीर को एक कागज़ से दूसरे कागज़ पर उतारने की कोशिश में, उस तस्वीर से बेइन्तिहाँ  प्यार होने लगे, वो सुकून है || जब खाली सड़क और सर्द मौसम का मिज़ाज़ , एक साथ इस कदर दस्तक दे , कि तीखे मोड़ से बेफिक्र आँखें खुद को मूँद, खुदा का शुक्रिया अदा करने लगे, वो सुकून है || जब कोई शब्दों का जादूगर, अपना करतब दिखा रहा हो, और ये जादू का शौक़ीन, उस जाद...

एक घड़ी बेहद पसंद है हमें

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एक घड़ी पसंद है हमें | बेहद पसंद | अभी हमारे मोहल्ले में एक नई दुकान खुली है, वहीं देखा उसको | यूँ केवल ऊपर से देखोगे तो शायद बहुत ही सरल और साधारण सी लगे तुमको लेकिन अगर रुको, ठहरो, ध्यान से देखो और समझने की कोशिश करो तो शायद जान पाओगे कि वो कितनी बेशकीमती है | इतनी कीमती कि बिकाऊ नहीं है वो, साथ में पड़ी भूरे रंग की लकड़ी की पट्टी पर लिखा पाओगे | नज़र को थोड़ा इधर उधर करोगे तो तुम्हे दिखेंगी घड़ियाँ और भी,  कुछ महंगी, कुछ ज़्यादा चमकदार | लेकिन वो होता है ना, कि तुम्हारा वो नाजुक सा दिल कहाँ जाकर अटका है, तो बस हमें वही पसंद आई | मन को इतनी भाती है वो घड़ी कि हर रोज़ कोई ना कोई बहाना ढून्ढकर उस दुकान के नज़दीक से गुजरा करते हैं और जब उस दुकान का मालिक वहाँ नहीं होता तो घंटो तक उसी को ताकते रहते | देखते रहते कि कैसे एक तरफ शान्ति से बैठकर भी पूरी दुनिया को अपने हिसाब से चला रही है | दिन में जितनी बार वो मिनट वाली सुई नहीं घूमती होगी, उससे ज़्यादा तो हम वहाँ घूमा करते हैं | और हाँ एक बात और, वो घड़ी इतनी ख़ास है कि अगर कोई उसकी कीमत लगाता भी, तो भी शायद हम खरीद ना पाते  | सुना है...

जादू !

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चलो तुमको बीते दिनों का एक किस्सा सुनाते हैं | किस्सा यूं कि हम थे अपने सफर पे सवार, होठों पर गीत के बोल गुनगुनाते हुए - " मिलो ना तुम ..मुझे ..कभी " कि तभी हमारी नज़र एक भीड़ पर पड़ी | भीड़ इस कदर थी कि मानो शक्कर के दाने पर चीटियो का प्रहार | बचते बचाते, बड़ी ही सावधानी से चीटियों को हटाकर देखा तो शक्कर का टुकड़ा था - एक जादूगर | जादूगर -  ऐसे कलाकार   जो किसी तरह से कुछ तो करते है कि कभी चीज़ें ओझल हो जाती  हैं  तो कभी डबल | बचपन से  हम इनके  इस कदर शौक़ीन थे  कि  मानो वो जादू टीवी के अंदर से हमारे ऊपर ही हो रहा हो | नज़रें हटती नहीं थी और हाथ बन जाते थे कलाकार, जैसे कला को दोहराने से ही जादू होने वाला हो |   अब  वहाँ देखा  तो  उसके जादू और रंगीन लिवाज़ के आगे, पूरी भीड़ में हम थे नजरअंदाज | " अरे जादू वाले भैया, कुछ नया और अच्छा दिखाओगे या वही पुरानी कलाबाज़ी " गले से इतना तेज़ निकल गया कि पूरी भीड़  की  निगाहें हमारी तरफ, जैसे अगले जादू के करतब  की  बारी हमारी | "अरे भैया ! हम तो ये बोल रहे थे कि मजा आ रहा है दि...

तू जानवर या मैं जानवर

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( जब वो हथिनी आखिरी पलों में नदी में खड़ी थी तो शायद ऐसा कुछ सोच रही होगी )..... क्या करेगा ये जानकर | कि तू जानवर या मैं जानवर || तेरी तरह था जीवन मेरा , कर रही थी अपना गुजर बसर | हुआ धमाका अंदर एक, सारे सपने गए बिखर || बचपन में जो पीठ पसंद थी, सवारी की थी इधर उधर | उसी पीठ में खंजर घोंपा और फिर जला दिया उसी पहर || मनोरंजन ही चाहिए था या थे तुम दांतों के सौदागर | कोई और तरीका ढून्ढ लेते, खड़े तो थे सर झुकाकर || वही खड़े हो या भाग चुके हो, अपना  काला  मुँह छुपाकर | आत्मा भी ना रोई होगी, बारूद वाला फल खिलाकर || नवजात शिशु था कोख में मेरी, ये जानोगे तुम कल जाकर | " दम घुटा रहा होगा, सांस नहीं आ रही होगी ", तड़प रही हूँ यही सोचकर || न कुछ बिगड़ा है तेरा और ना कोई  कुछ  बिगाड़ेगा | खुश हो जा और मौज मना तू, यही जानकर, यही मानकर || जिस नदी में खड़ी रही मैं, आखिरी सांस तक सूंड डुबाकर | उसी नदी मैं डूब मरो तुम, सुन इंसानी रूप जानवर || अब तू ही मुझको ये बतला तो | कि तू जानवर या मैं जानवर ||                        ...

How privileged I am..

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PS - Rotate your phone to landscape mode for better reading. How privileged I am... that I have not been diagnosed with this virus "Corona"- an uninvited guest, that I have all the access to PPE's & to the doctors doing their best. that I didn't get stuck somewhere far away or at some remote location, that I am able to spend quality time with my family like any other vacation. How privileged I am... that I am not those migrants who have to walk miles in scorching heat to reach their home, that I have been watching web series all day, turning my AC ON. that still I am employed and my salary is being credited before the month ends, unlike those who lost their jobs and nowhere to go, everytime the economy bends. How privileged I am... that I am not residing in areas completely shattered by Amphan cyclone, that all this time I am pursuing my hobbies and not feeling alone. that my house is intact and not taken away by huge floods, ...

चैन की नींद

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(a story from somewhere around 2009) ये उन दिनों की बात है जब हमारे घर के बाहर कुत्ते/कुतिया रहा करते हैं | दरअसल हमारा घर उस चॉल के पुराने मकानों में से एक होता था जो कितने ही सालों से मिट्टी की बुनियाद पर ही खड़े थे | अब ये गली के बफादार जानवर ना तो घर के होते थे ना घाट के | जब मन किया तो आ गए और नहीं तो कहो पूरा दिन, दिखाई भी न दे आपको | पड़ोस की एक छोटी सी कोठरी में घर बना लिया था इन्होने अपना | काटने या डरने जैसी तो कोई परेशानी नहीं थी इनसे लेकिन सबसे बड़ी समस्या थी की ये घर के बाहर गंदगी कर जाते थे | अब मोदीजी की बात कहाँ पता थी उनको जो शौचालय के बारे में सोचते | इनका तो एक ही सिद्धांत था " जहाँ लगा,  वहाँ  हगा " |  पूरी पड़ोस इनकी गंदगी से परेशान थी और अब इस समस्या का हल किसी को समझ नहीं आ रहा था क्यूंकि इन्हे मारने का सवाल ही नहीं उठता था ,और कहीं दूर ले जा कर छुडवा दो तो ये वापस आ जाते थे | फिर सब यही सोचते थे की बूढ़े होकर अपने आप ही मर जाएंगे | लेकिन ऐसा होने से पहले वो अपने बच्चों को जन्म दे जाते थे और फिर उनके मरने के बाद, यही परेशानी उनके बच्चों से होने ल...

16 मजदूर

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09/05/2020  वो 16  मजदूर नहीं थे, 16 मजबूर थे | भूख के मारे थे , पैसे की किल्लत थी और अपनों से दूर थे || सब्र दिखाया था उन्होंने, सरकार घर पहुंचाएगी उनको | तभी तो अब तक के सारे इंतज़ार, उनको मंजूर थे || लेकिन कब तक रुकते, कब तक रोते, चल दिए पैदल ही | अभी तो 40 km ही चले थे, मंजिल से बेहद दूर थे || सोचा पटरी के रास्ते ही चले जायेंगे ताकि पुलिस से बच सकें | "रेल मिलेगी तो पकड़ लेंगे" - आँखों में ख्याबों के ऐसे नूर थे | थक गए तो बैठ लिए पटरी पर और आँख लग गयी | पैरों के दर्द और छालों के कुसूर थे || रेलगाड़ी आयी भी, और सब अपने घर भी गए | लेकिन साबुत कोई न बचा, सब के सब चकनाचूर थे || किसको परवाह थी ऐसे मजदूरों की | हम सब तो अपने आप में मगरूर थे || हमारे बीच तो 1 मीटर का ही फासला था, घर तो उनके मीलों दूर थे | वो केवल 16 मजदूर नहीं थे साहब, वो तो लाखों में ऐसे 16 मजबूर थे || May their souls rest in peace.....                        (Victims of Aurangabad train...