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Showing posts from June, 2020

एक घड़ी बेहद पसंद है हमें

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एक घड़ी पसंद है हमें | बेहद पसंद | अभी हमारे मोहल्ले में एक नई दुकान खुली है, वहीं देखा उसको | यूँ केवल ऊपर से देखोगे तो शायद बहुत ही सरल और साधारण सी लगे तुमको लेकिन अगर रुको, ठहरो, ध्यान से देखो और समझने की कोशिश करो तो शायद जान पाओगे कि वो कितनी बेशकीमती है | इतनी कीमती कि बिकाऊ नहीं है वो, साथ में पड़ी भूरे रंग की लकड़ी की पट्टी पर लिखा पाओगे | नज़र को थोड़ा इधर उधर करोगे तो तुम्हे दिखेंगी घड़ियाँ और भी,  कुछ महंगी, कुछ ज़्यादा चमकदार | लेकिन वो होता है ना, कि तुम्हारा वो नाजुक सा दिल कहाँ जाकर अटका है, तो बस हमें वही पसंद आई | मन को इतनी भाती है वो घड़ी कि हर रोज़ कोई ना कोई बहाना ढून्ढकर उस दुकान के नज़दीक से गुजरा करते हैं और जब उस दुकान का मालिक वहाँ नहीं होता तो घंटो तक उसी को ताकते रहते | देखते रहते कि कैसे एक तरफ शान्ति से बैठकर भी पूरी दुनिया को अपने हिसाब से चला रही है | दिन में जितनी बार वो मिनट वाली सुई नहीं घूमती होगी, उससे ज़्यादा तो हम वहाँ घूमा करते हैं | और हाँ एक बात और, वो घड़ी इतनी ख़ास है कि अगर कोई उसकी कीमत लगाता भी, तो भी शायद हम खरीद ना पाते  | सुना है...

जादू !

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चलो तुमको बीते दिनों का एक किस्सा सुनाते हैं | किस्सा यूं कि हम थे अपने सफर पे सवार, होठों पर गीत के बोल गुनगुनाते हुए - " मिलो ना तुम ..मुझे ..कभी " कि तभी हमारी नज़र एक भीड़ पर पड़ी | भीड़ इस कदर थी कि मानो शक्कर के दाने पर चीटियो का प्रहार | बचते बचाते, बड़ी ही सावधानी से चीटियों को हटाकर देखा तो शक्कर का टुकड़ा था - एक जादूगर | जादूगर -  ऐसे कलाकार   जो किसी तरह से कुछ तो करते है कि कभी चीज़ें ओझल हो जाती  हैं  तो कभी डबल | बचपन से  हम इनके  इस कदर शौक़ीन थे  कि  मानो वो जादू टीवी के अंदर से हमारे ऊपर ही हो रहा हो | नज़रें हटती नहीं थी और हाथ बन जाते थे कलाकार, जैसे कला को दोहराने से ही जादू होने वाला हो |   अब  वहाँ देखा  तो  उसके जादू और रंगीन लिवाज़ के आगे, पूरी भीड़ में हम थे नजरअंदाज | " अरे जादू वाले भैया, कुछ नया और अच्छा दिखाओगे या वही पुरानी कलाबाज़ी " गले से इतना तेज़ निकल गया कि पूरी भीड़  की  निगाहें हमारी तरफ, जैसे अगले जादू के करतब  की  बारी हमारी | "अरे भैया ! हम तो ये बोल रहे थे कि मजा आ रहा है दि...

तू जानवर या मैं जानवर

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( जब वो हथिनी आखिरी पलों में नदी में खड़ी थी तो शायद ऐसा कुछ सोच रही होगी )..... क्या करेगा ये जानकर | कि तू जानवर या मैं जानवर || तेरी तरह था जीवन मेरा , कर रही थी अपना गुजर बसर | हुआ धमाका अंदर एक, सारे सपने गए बिखर || बचपन में जो पीठ पसंद थी, सवारी की थी इधर उधर | उसी पीठ में खंजर घोंपा और फिर जला दिया उसी पहर || मनोरंजन ही चाहिए था या थे तुम दांतों के सौदागर | कोई और तरीका ढून्ढ लेते, खड़े तो थे सर झुकाकर || वही खड़े हो या भाग चुके हो, अपना  काला  मुँह छुपाकर | आत्मा भी ना रोई होगी, बारूद वाला फल खिलाकर || नवजात शिशु था कोख में मेरी, ये जानोगे तुम कल जाकर | " दम घुटा रहा होगा, सांस नहीं आ रही होगी ", तड़प रही हूँ यही सोचकर || न कुछ बिगड़ा है तेरा और ना कोई  कुछ  बिगाड़ेगा | खुश हो जा और मौज मना तू, यही जानकर, यही मानकर || जिस नदी में खड़ी रही मैं, आखिरी सांस तक सूंड डुबाकर | उसी नदी मैं डूब मरो तुम, सुन इंसानी रूप जानवर || अब तू ही मुझको ये बतला तो | कि तू जानवर या मैं जानवर ||                        ...